अहोई अष्टमी व्रत के नियम: इन नियमों का पालन करे बिना यह व्रत निष्फल हो जायेगा

अहोई अष्टमी व्रत के नियम

अहोई अष्टमी व्रत के नियम, इस व्रत का एक महत्वपुर्ण भाग हैं। यदि व्रत करते समय इन नियमों की अवहेलना हो जाती है तो आपके द्वारा किया जा रहा अहोई अष्टमी व्रत आपके लिए पूर्ण फलदायी नहीं होगा। यदि आप चाहती हैं की अहोई अष्टमी का व्रत पूर्ण फलदायी हो और आपकी संतान इस व्रत फल से पूर्ण लाभान्वित हो तो इसके लिए अहोई अष्टमी व्रत के नियमों का पालन करें।

अहोई अष्टमी का व्रत कार्तिक माह में कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को को रखा जाता है। व्रत इस दिन माँ पार्वती की अहोई माता के रूप में पूजा की जाती है। महिलायें यह व्रत अपनी संतान की लम्बी आयु और सुखी जीवन के लिए रखती हैं।

आज हम आपको बताएँगे की अहोई अष्टमी व्रत के नियम कौन-कौन से होते हैं और उनका पालन किस प्रकार किया जाता है

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अहोई अष्टमी व्रत के नियम निम्नलिखित हैं:

शुद्धता : व्रत रखने से पहले माताएं स्नान करके शुद्ध हो जाती हैं। इस दिन बिना स्नान किये पूजा अर्चना न करें।

गणपति पूजन : अहोई अष्टमी के व्रत में गणेश जी की पूजा का विशेष महत्व होता है। व्रत की पूजा करते समय सबसे पहले भगवान् गणेश की पूजा करें।

व्रत पारण : अहोई अष्टमी व्रत का पारण, हमेशा सूर्यास्त के बाद तारों को अर्घ्य देकर ही किया जाता है। कुछ स्थानों पर लोग अपनी पारम्परिक मान्यताओं के अनुसार तारों की जगह चाँद को अर्घ्य देकर अपने व्रत का पारण करते हैं।

कांसे का लोटा : अहोई अष्टमी व्रत के दिन, व्रत पारण के समय अर्घ्य देते समय कभी भी कांसे के लोटे का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए।

सात अनाज : व्रत रखने वाली माताओं को इस दिन व्रत कथा सुनते समय अपने हाथ में 7 तरह का अनाज रखना चाहिए। कथा पूरी होने के बाद इस अनाज को किसी बर्तन में रख लें और पूजा समाप्त होने पर उसी दिन या अगले दिन गाय को खिला दें।

काले रंग के कपड़े : व्रत रखने वाली महिलायें इस दिन काले रंग के वस्त्र न पहनें।

लड़ाई-झगड़ा : व्रत रखने वाली महिलाओं को इस दिन किसी से लड़ाई-झगड़ा नहीं करना चाहिए।

मिटटी की खुदाई : व्रत रखने वाली महिलाओं को इस दिन मिटटी से जुड़े कामों से बचना चाहिए। विशेष रूप से इस दिन मिटटी की खुदाई नहीं करनी चाहिए। इसके पीछे की पौराणिक कथा यह है कि मिटटी की खुदाई करते समय एक साहूकारनी के हाथों साही (सेई ) का बच्चा मारा गया। इसके बाद उस साहूकारनी का परिवार उजड़ गया था।

इसके बाद अहोई माता और साही की पूजा करने के बाद ही उसके घर की सुख-शांति वापिस आयी और उस साहूकारनी को संतान की प्राप्ति हुई। तभी से अहोई अष्टमी का व्रत रखने की परम्परा चली आ रही है।

कटु वचन : इस दिन माताएं किसी भी तरह का कटु वचन नहीं बोलती हैं।

व्यसन : वे किसी भी तरह का व्यसन नहीं करना चाहिए।

दान : अहोई अष्टमी के दिन दान देना भी शुभ माना जाता है। दरिद्रों और गरीबों को खाना और धन देकर अच्छा कर्म करना चाहिए। इससे आपका व्रत फलदायी होगा।

इस दिन पूजा करते समय अपने बच्चों को अपने पास बैठाएं। अहोई माता को भोग लगाने के बाद वो प्रसाद अपने बच्चों को खिलाना चाहिए।

अहोई अष्टमी व्रत को रखने से माताओं को अपनी संतान की लंबी आयु और उनके अच्छे स्वास्थ्य की प्राप्ति होती है। इस व्रत को रखने से माता और संतान के बीच का रिश्ता भी मजबूत होता है।

ध्यान दें कि ये नियम समान रूप से नहीं हो सकते हैं, क्योंकि इन्हें व्यक्ति की संस्कृति और परंपरा के आधार पर अनुकूलित किया जाता है।

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