आज के समय में भारतीय समाज में जिस प्रकार ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र इन चार वर्णों को लोगों की जातियाँ बताकर समाज मे अलगाव पैदा किया जा रहा है साथ ही शूद्र वर्ण को निचली जाती बताकर उन्हें भ्रमित किया जा रहा है कि आप लोगों का प्राचीन समय रामायण, महाभारत काल से ही शोषण किया जाता रहा है। ऐसे में प्रश्न यह उठता है कि रामायण में शूद्र कौन थे।
आज हम इस प्रश्न का उत्तर आपको रामायण के माध्यम से ही बताएंगे।
रामायण में शूद्र कौन थे
रामायण में “शूद्र” का उल्लेख सामाजिक वर्ण व्यवस्था के संदर्भ में किया गया है, जो प्राचीन भारतीय समाज में चार वर्णों—ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र—में से एक था। रामायण में शूद्रों के विषय में बताते हुए निषाद राज गुहा, केवट, शबरी से जुड़े प्रसंगों का वर्णन मिलता है।
रामायण में निषाद राज गुहा, केवट, शबरी सामाजिक वर्ण व्यवस्था के अंतर्गत “शूद्र” थे।
इन्हें मुख्य रूप से सेवा कार्यों से जोड़ा जाता था, जैसे कि शारीरिक श्रम और अन्य सेवा-संबंधी कार्य। यह व्यवस्था उस समय की वर्ण-व्यवस्था के अनुसार थी।
शूद्र वर्ण के लिए फैलाया गया भ्रम
वर्तमान समय में हिन्दू समाज को बाँटने के लिए ऐसा बोला जाता है कि रामायण काल से ही शूद्र को वर्ण व्यवस्था में सबसे निचले स्तर पर माना जाता था। उन्हें मंदिर जाने का अधिकार नहीं था, अपना सम्पूर्ण जीवन उन्हें केवल ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य की सेवा करते हुए व्यतीत करना होता था। उन्हें अपनी संपत्ति रखने का कोई अधिकार नहीं था।
कहा जाता है कि रामायण काल में शूद्रों (दलितों) को किसी से किसी से भी कोई प्रश्न पूछने का अधिकार नहीं था। ऐसा अपराध करने पर उनके मुंह में गर्म लोहा डाल दिया जाता था। किन्तु यह सब बातें केवल झूठ ही हैं।
इन बातों को सच साबित करने और समाज को भ्रमित करने के लिए हिन्दू धर्म ग्रंथों में कुछ गलत बातें जोड़ी गयी हैं साथ ही बहुत से श्लोकों की गलत व्याख्या करी गयी है। आगे हम आपको बताएँगे कि मनुस्मृति में दलितों की बारे में क्या लिखा है। कहा जाता है आज के समय के जो दलित हैं प्राचीन काल में उन्हें शूद्र कहा जाता था।
मनुस्मृति जिसको अक्सर प्राचीन भारत का संविधान कहा जाता है। यह उस समय का एक धर्मशास्त्र (कानूनी ग्रंथ) था।
मनुस्मृति में एक श्लोक है – ” जन्मना जायते शूद्र: संस्कारात् द्विज उच्यते, वेदपाठात् भवेत् विप्र: ब्रह्म जानाति ब्राम्हण:।“
अर्थ: इस श्लोक से स्पष्ट है कि जन्म से सभी शूद्र होते हैं और जब वे आचार, व्यवहार, चरित्र और विद्या जान जाते हैं तो वे द्विज हो जाते हैं, यानी दोबारा जन्म लेते हैं। वेद पढ़ने से द्विज का परिवर्तन विप्र में हो जाता है। समय-समय के संचित ज्ञान को वेद कहते हैं। विप्र जब वेदों को पढ़कर हृदय में धारण कर लेता है तो वह ब्रह्म का जानकार होकर ब्राम्हण बन जाता है।
अब हम उस भ्रान्ति पर बात करते है जिसके बारे में ऊपर लिखा है कि “रामायण काल से शूद्रों को किसी से भी कोई प्रश्न पूछने का अधिकार नहीं था। ऐसा अपराध करने पर उनके मुंह में गर्म लोहा डाल दिया जाता था।”
मनुस्मृति जो उस समय का एक धर्मशास्त्र (कानूनी ग्रंथ) था अर्थात उसी के अनुसार सामाजिक व्यवस्था के सारे नियम बने हुए थे। अब आप लोग स्वयं ही सोचिये जिस मनुस्मृति में एक श्लोक के माध्यम से बताया गया है कि जन्म से हर कोई शूद्र है और आगे चलकर मनुष्य का वर्ण उसके कर्मों से निर्धारित होता है। जीवन में मनुष्य द्वारा किये गए कर्म यह तय करते हाँ कि वह मनुष्य ब्राह्मण बनेगा, क्षत्रिय बनेगा, वैश्य बनेगा या शूद्र ही रहेगा।
उपर मनुस्मृति के एक श्लोक के बारे में बताया गया है – ” जन्मना जायते शूद्र: संस्कारात् द्विज उच्यते, वेदपाठात् भवेत् विप्र: ब्रह्म जानाति ब्राम्हण:।“ इस श्लोक से स्पष्ट है कि जन्म से सभी शूद्र होते हैं
जन्म से हर कोई शूद्र है अर्थात ब्राह्मण और क्षत्रिय के घर में जन्म लेने वाला बालक भी शूद्र ही होगा। अब हम उस भ्रान्ति पर बात करते हैं जिसमे बताया गया है कि “रामायण काल से शूद्रों को किसी से भी कोई प्रश्न पूछने का अधिकार नहीं था। ऐसा अपराध करने पर उनके मुंह में गर्म लोहा डाल दिया जाता था।”
हमें भ्रमित किया जाता है कि शूद्र को प्रश्न पूछने का कोई अधिकार नहीं था और ऐसा करने पर उसके मुंह में गर्म लोहा डाल दिया जाता था आप स्वयं सोचिये क्या कोई व्यक्ति अपने बालक द्वारा प्रश्न पूछने पर उसके मुंह में गर्म लोहा डालेगा। कोई ऐसा सोच भी नहीं सकता।
इससे यह सिद्ध होता है प्राचीन काल से ही शूद्रों के ऊपर अत्याचार के बारे में बताई गयी सारी बातें झूठ हैं। मनुस्मृति वास्तव एक ऐसा ग्रन्थ है, जिसे मानवधर्मशास्त्र माना जाता है, यह ग्रन्थ सामाजिक और धार्मिक आचरण के लिए नियम प्रदान करता है।
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