श्राद्ध (पितरों का तर्पण) एक ऐसा कर्मकांड है जिसमें पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए भोजन और जल का अर्पण किया जाता है। इसी दौरान बहुत से लोगों के मन में यह प्रश्न होता है कि श्राद्ध में कौए और कुत्ते को क्यों खिलाएं। इनको खाना खिलाने का हमारे पितरों की संतुष्टि से क्या सम्बन्ध है।

श्राद्ध में कौए और कुत्ते को क्यों खिलाएं | Shradh me Crow or Dog ko kyun khilayen
गरुड़ पुराण और अन्य धार्मिक ग्रंथों में बताया गया है कि श्राद्ध के दौरान कौए और कुत्ते को भोजन देना चाहिए। ऐसा विश्वास है कि पितर विभिन्न रूपों में आकर भोजन ग्रहण करते हैं, कौआ उनमें से एक रूप है और कुत्ते को भोजन देने से पितरों की आत्मा को शांति मिलती है और यमराज प्रसन्न होते हैं। इसीलिए श्राद्ध में कौए और कुत्ते को भोजन खिलाना चाहिए।
यदि हम इस बारे में ओर गहराई से जानने का प्रयास करते हैं तो हमारे धार्मिक ग्रंथों जैसे गरुड़ पुराण और महाभारत में इस विषय से सम्बंधित श्लोक मिलते हैं ।
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गरुड़ पुराण (कौए का महत्व)
काकाः पितृरूपेण शुद्धभावेन भुज्यते।
यत्र काकः समायाति तत्र पितृगणाः स्थिताः॥
(गरुड़ पुराण, पूर्व खंड, अध्याय 14)
अर्थ:
कौए को पितरों का रूप माना गया है। जहाँ कौआ श्रद्धा से भोजन करता है, वहाँ पितरों का वास होता है और वे तुष्ट होते हैं।
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महाभारत (कुत्ते का महत्व)
सत्यं धर्मः परो धर्मो धर्मराजः स्वयम्भुवः।
धर्मरूपधरो धर्मो धर्मरूपेण शंसितः॥
(महाभारत, वनपर्व, अध्याय 313)
महाभारत के स्वर्गारोहण पर्व में वर्णन है कि युधिष्ठिर जब स्वर्ग की यात्रा कर रहे थे तो उस समय एक कुत्ता उनके साथ था, जो अंत में धर्मराज (यमराज) के रूप में प्रकट हुआ।
कुत्ता धर्मराज का प्रतीक है। कुत्ते को भोजन देना धर्मराज और पितरों को प्रसन्न करने के समान माना गया है।
कौआ (वायु तत्व) और कुत्ता (पृथ्वी तत्व) – इन दोनों को भोजन देकर हम पंचमहाभूतों का सम्मान भी करते हैं। श्राद्ध में ब्राह्मण, गाय, कुत्ता, कौआ, चींटी और अन्य जीवों को अन्न देना “सर्वभूतहित” (सभी प्राणियों का कल्याण) का प्रतीक है।
shradh me jeevon ko bhojan खिलाना मनुष्य का प्रकृति और पर्यावरण से जुड़ाव भी दर्शाता है। कौए और कुत्ते प्रकृति का हिस्सा हैं और इनका पालन-पोषण करना पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारी को दर्शाता है। यह परंपरा जीव-जंतुओं के प्रति सम्मान और सहानुभूति को भी बढ़ावा देती है।
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