पितरों को जल (तर्पण) देना हिंदू परंपरा में पितरों का सम्मान और आशीर्वाद प्राप्त करने का तरीका है। यह सामान्यत: प्रतिदिन सुबह या पितृपक्ष के समय किया जाता है। यहाँ पितरों को जल देने की सरल विधि बताई गयी है:

पितरों को जल देने की सरल विधि | Pitron ko Jal dene ki saral vidhi
तर्पण विधि: पितृपक्ष में पितरों को जल देने के लिए एक लौटे जल में तिल और कुशा डालकर घर के आँगन, छत या फिर नदी, तालाब के किनारे दक्षिण दिशा की ओर मुख करके धीरे-धीरे जल दक्षिण दिशा की ओर अर्पित करें। पितरों को जल देते समय “ॐ पितृभ्यो नमः” मंत्र बोलना चाहिए।
दक्षिण दिशा पितरों की होती है इसीलिए पितरों को जल हमेशा दक्षिण दिशा में देना चाहिए। आगे विस्तारपूर्वक पितरों को जल देने के विषय में बताया गया है।
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पितृपक्ष में पितरों को जल देना विशेष महत्व रखता है। पितरों को जल देने का तरीका भी महत्वपूर्ण होता है। पितरों को जल देते समय हमेशा इस बात का ध्यान रखें कि पितरों को जल अर्पण से पहले स्नानादि करके स्वच्छ वस्त्र अवश्य पहनें।
बहुत से लोगों के मन में यह प्रश्न होता है, क्या पितरों को रोज जल देना चाहिए तो शास्त्रों में पितरों को रोज़ जल देना बहुत शुभ और पुण्यदायी माना गया है, लेकिन यह अनिवार्य नहीं है।
यह आपकी श्रद्धा और समय की उपलब्धता पर निर्भर करता है।
पितरों को जल देने (tarpan vidhi) का सही समय शास्त्रों में बहुत स्पष्ट बताया गया है। सही समय पर तर्पण करने से इसका फल कई गुना बढ़ जाता है। पितरों को जल देने का समय प्रातः काल सबसे श्रेष्ठ है।
सूर्योदय के बाद और प्रातः 9 बजे तक तर्पण कर लेना चाहिए।
तर्पण ( जल ) देने के दौरान ध्यान देने योग्य बातें
जल अर्पण हमेशा दक्षिण दिशा की ओर करें।
नंगे पांव और सिर ढककर (गमछा/अंगोछा) जल दें।
पवित्र मन से पितरों का स्मरण करना सबसे महत्वपूर्ण है।
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