क्या आप जानते हैं|श्राद्ध कब नहीं करना चाहिए, तो चलिए आपको बताते हैं

हिंदू धर्म में, श्राद्ध (Shradh) एक महत्वपूर्ण धार्मिक अनुष्ठान है जो पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए किया जाता है। यह अनुष्ठान पितृ पक्ष के दौरान किया जाता है, जो भाद्रपद मास की पूर्णिमा से अश्विन मास की अमावस्या तक चलता है। श्राद्ध के माध्यम से लोग अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना करते हैं। लेकिन कुछ ऐसे दिन भी होते हैं जिनमे श्राद्ध करना वर्जित होता है। क्या आप जानते हैं श्राद्ध कब नहीं करना चाहिए।

श्राद्ध कब नहीं करना चाहिए

तो चलिए इस लेख के माध्यम से करते हैं आपकी जिज्ञासा को शांत।

श्राद्ध कब नहीं करना चाहिए

शास्त्रों में कुछ ऐसे दिनों के बारे में भी बताया गया है जब श्राद्ध करना वर्जित माना जता है। जैसे – शनिवार, दशहरा और सूर्य ग्रहण के दिन श्राद्ध नहीं करना चाहिए। यदि किसी की अकाल मृत्यु हुई हो तो उसका श्राद्ध मृत्यु की तिथि वाले दिन कभी नहीं करना चाहिए।

श्राद्धकर्म के लिए वर्जित दिन इस प्रकार हैं:

  • शनिवार – शनिवार को भगवान शिव का दिन माना जाता है। इस दिन, भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए व्रत और उपवास किया जाता है। इसलिए, इस दिन किसी अन्य व्यक्ति के लिए श्राद्ध करना वर्जित माना जाता है।
  • अकाल मृत्यु – यदि किसी व्यक्ति की अकाल मृत्यु हुई है जैसे: आत्महत्या, हत्या, दुर्घटना, सांप का के काटने से हुई मृत्य। तो ऐसे व्यक्तियों का श्राद्ध उनकी मृत्यु तिथि वाले दिन कभी नहीं करना चाहिए। अकाल मृत्यु वाले लोगों का श्राद्ध केवल चतुर्दशी तिथि को ही करना चाहिए।
  • दशहरा – दशहरा को विजयदशमी के रूप में भी जाना जाता है। इस दिन, भगवान राम ने रावण का वध किया था। इसलिए, इस दिन किसी अन्य व्यक्ति के लिए श्राद्ध करना वर्जित माना जाता है।
  • सूर्य ग्रहण – सूर्य ग्रहण के दिन भी श्राद्ध नहीं किया जाता है, क्योंकि इसे भी अशुभ माना जाता है।

किसी भी गलत तिथि के चुनाव से बचने के लिए श्राद्ध का आयोजन करने से पहले स्थानीय पंडित या पुजारी से परामर्श लेना हमेशा बेहतर होता है ताकि सही समय और तिथि का चयन किया जा सके।

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2024 में पितृपक्ष कब लगेगा

2024 में पितृपक्ष ( श्राद्ध ) 17 सितंबर, मंगलवार से शुरू होगा और 02 अक्टूबर, बुधवार को समाप्त होगा। पितृपक्ष की शुरुआत भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा से होती है और आश्विन माह के कृष्ण पक्ष की अमावस्या तक रहती है।

पितृपक्ष की तिथियां:

  • 17 सितंबर, मंगलवार – पूर्णिमा श्राद्ध
  • 18 सितंबर, बुधवार – प्रतिपदा श्राद्ध
  • 19 सितंबर, गुरूवार – द्वितीया श्राद्ध
  • 20 सितंबर, शुक्रवार – तृतीया श्राद्ध
  • 21 सितंबर, शनिवार – चतुर्थी श्राद्ध
  • 22 सितंबर, रविवार – पंचमी श्राद्ध
  • 23 सितंबर, सोमवार – षष्ठी श्राद्ध
  • 23 सितंबर, सोमवार – सप्तमी श्राद्ध
  • 24 सितंबर, मंगलवार – अष्टमी श्राद्ध
  • 25 सितंबर, बुधवार – नवमी श्राद्ध
  • 26 सितंबर, गुरुवार – दशमी श्राद्ध
  • 27 सितंबर, शुक्रवार – एकादशी श्राद्ध
  • 29 सितंबर, रविवार – द्वादशी श्राद्ध
  • 30 सितंबर, सोमवार – त्रयोदशी श्राद्ध
  • 01 अक्टूबर, मंगलवार – चतुर्दशी श्राद्ध
  • 02 अक्टूबर, बुधवार – सर्व पितृ अमावस्या

हिंदू धर्म में, पितृपक्ष ( श्राद्ध ) का विशेष महत्व है। पितृपक्ष में पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए श्राद्ध करने की परम्परा सदियों से चली आ रही है।

पितृपक्ष में श्राद्ध कब करना चाहिए

पितृपक्ष में श्राद्ध करने के लिए अच्छा दिन पितृपक्ष की अमावस्या तिथि होती है। इस दिन श्राद्ध करने से पितरों को सबसे अधिक लाभ होता है और हमारे पितरों को शान्ति मिलती है। इसके अलावा, पितृपक्ष के किसी भी दिन श्राद्ध किया जा सकता है।

श्राद्ध करने के लिए सबसे पहले अपने पूर्वजों की मृत्यु की तिथि देखें। उस तिथि को श्राद्ध करना सबसे श्रेष्ठ माना जाता है। यदि इस बारे में जानकारी न हो तो श्राद्ध करने के लिए पितृपक्ष की अमावस्या तिथि ही सबसे सही होती है। यदि आपको इसके बारे में और अधिक जानकारी चाहिए, तो स्थानीय पंडित, पुजारी से सलाह लेना भी अच्छा रहेगा।

पहला श्राद्ध कैसे करें

किसी की मृत्यु होने पर पहला श्राद्ध पितृ पक्ष की पूर्णिमा तिथि को किया जाता है। इस दिन, मृत व्यक्ति के परिवार के सदस्य पितरों के लिए श्राद्ध और तर्पण करते हैं। श्राद्ध में, पितरों को भोजन, जल, फूल, और फल आदि अर्पित किए जाते हैं। इसके बाद ब्राह्मणों को भोजन कराया जाता है।

पहले श्राद्ध को बरसी भी कहा जाता है। बरसी का अर्थ है, वर्षगांठ। पहला श्राद्ध मृत व्यक्ति की मृत्यु के एक वर्ष बाद किया जाता है।

पहला श्राद्ध करने के लिए निम्नलिखित बिंदुओं का पालन करें:

  • श्राद्ध करने के लिए शौचादि से निवृत होकर स्नान करें और शुद्ध हो जाएं।
  • श्राद्ध के लिए आवश्यक सामग्री एकत्र करें। जो इस प्रकार है:
  • जौ, काला तिल, फूल, कुशा ( एक प्रकार की घास ), चावल, गंगाजल, मिठाई, दक्षिणा, ब्राह्मणों के लिए भोजन।
  • पुरे घर में सफाई करें और फिर श्राद्ध करने के लिए एक पवित्र स्थान चुनें।
  • इसके बाद एक चौकी पर पीला कपड़ा बिछाएं।
  • चौकी पर पूर्वजों की तस्वीर या चित्र रखें।
  •  श्राद्ध के दौरान पितरों को जल, अन्न, फल, फूल, मिठाई, और दक्षिणा आदि अर्पित करें।
  • श्राद्ध के बाद ब्राह्मणों को भोजन कराएं।

यदि संभव हो तो स्थानीय पंडित या पुजारी से संपर्क करें, ताकि उनके मार्गदर्शन में आप विधिपूर्वक अपने पितरों का श्राद्ध कर सकें और आपके पितरों की आत्मा को शान्ति और वे आपको आशीर्वाद दें।

श्राद्ध करने के कुछ महत्वपूर्ण नियम:

  • श्राद्ध करते समय शांत और पूरा ध्यान पूजा में लगाएं।
  • श्राद्ध करने से पहले स्नान करके शुद्ध हो जाएं।
  • श्राद्ध में पितरों को केवल शुद्ध और पवित्र चीजें अर्पित करें।
  • श्राद्ध के बाद ब्राह्मणों को भोजन अवश्य कराएं।

पिता का श्राद्ध कैसे करें

पिता का श्राद्ध भी उसी विधि से किया जाता है, जिस विधि से अन्य पूर्वजों का श्राद्ध किया जाता है। यदि श्राद्ध करने वाला व्यक्ति अपने पिता की पुण्य तिथि जानता है तो उसी दिन श्राद्ध करे नहीं तो पितृपक्ष की अमावस्या तिथि श्राद्ध करने के लिए सबसे अच्छा दिन है। इस दिन श्राद्ध करने से सभी ज्ञात-अज्ञात पितरों/पूर्वजों की आत्मा को शांति मिलती है।

पिता का श्राद्ध करने के लिए एक नियम और है यह नियम ुमपर लागू होता ही जिनके पिता ने संन्यास लिया होता है। जिनके पिता ने संन्यास लिया होता है उनका श्राद्ध पितृ पक्ष की द्वादशी तिथि को करना चाहिए। इसलिए इस तिथि को संन्यासी श्राद्ध भी कहा जाता है।

श्राद्ध में क्या भोजन बनाना चाहिए

श्राद्ध के लिए बनाया जाने वाला भोजन सात्विक होना चाहिए। श्राद्ध में पितरों के लिए बनाये जाने वाले भोजन में खीर का विशेष महत्व माना जाता है। इसके साथ ही हम पूरी और कोई भी सब्जी जैसे कद्दू, आलू या छोलों की सब्जी बना सकते हैं और साथ ही भोजन में कोई भी मिठाई शामिल कर सकते है।

यदि आप अपने किसी पूर्वज जैसे आपके दादा आदि जो अब इस दुनिया में नहीं रहे, उनकी पसंद का भोजन जानते हो तो उसे भी श्राद्ध के दिन बनाये जाने वाले भोजन में शामिल करें। अन्यथा ऊपर बताई गयी वस्तुओं का इस्तेमाल करके पूरी शुद्धता के साथ अपने पितरों के श्राद्ध के लिए भोजन तैयार करें। क्यूंकि शुद्धता से पितृ प्रसन्न होते हैं और श्राद्ध का फल मिलता है।

श्राद्ध में गाय को क्या खिलाना चाहिए

पितृपक्ष में अपने पितरों को तृप्त करने के लिए हम नीचे दिए गए तरीकों से गाय की सेवा कर सकते हैं:

  • श्राद्ध में गाय को हरा चारा जैसे कि, घास, ज्वार, बाजरा, मक्का आदि खिलाना चाहिए।
  • गाय को ताज़ा और साफ़ पानी पिलाना चाहिए।

शाश्त्रो में हमें यह भी बताया गया है की यदि कोई व्यक्ति अति निर्धन होने के कारण या फिर अन्य किसी भी कारण से पितृपक्ष में अपने पूर्वजों का पिंडदान या श्राद्ध-कर्म करने में असमर्थ है, यो उसे पुरे श्रद्धा भाव से गाय को घास खिलानी चाहिए और गाय के समक्ष हाथ जोड़कर अपने पितरों की शान्ति के लिए प्रार्थना करनी चाहिए। ऐसा करने से श्राद्धकर्म पूरा होता है और पितर भी तृप्त होते हैं। 

यहाँ ध्यान देने वाली बात यह है कि गाय को घास खिलाकर पितरों का श्राद्ध करने पर श्राद्धकर्म तभी पूरा होगा जब आपके पास वास्तव में पितरों का श्राद्ध करने के लिए धन नहीं होगा या फिर अन्य किसी कारण से आप सक्षम नहीं होंगे।

यदि कोई व्यक्ति पैसा बचाने के लिए ऐसा करता है तो गाय को घास खिलाकर किया गया श्राद्धकर्म स्वीकार्य नहीं होगा, और उसके पितरों को तृप्ति नहीं मिलेगी।

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श्राद्ध में पंडित को क्या दान करना चाहिए

श्राद्ध में पंडित को कई वस्तुएं दान की जा सकती हैं, जिनमें से कुछ वस्तुएं इस प्रकार हैं:

  • दक्षिणा – दक्षिणा का अर्थ है “दान”। श्राद्ध में पंडित को दक्षिणा के रूप में धन या वस्तुएं दी जाती हैं। धन के रूप में, 51,101 या 501 रुपये का दान करना आम है। वस्तुओं के रूप में, पंडित को फल, मिठाई, कपड़े या अन्य उपहार दिए जा सकते हैं।
  • वस्त्र – श्राद्ध में पंडित को वस्त्र भी दिए जाते हैं। यह वस्त्र नए और साफ होने चाहिए।
  • उपयोगी वस्तुएं – श्राद्ध में पंडित को छाता, जूते जैसी उपयोगी वस्तुएं भी दान की जा सकती हैं
  • ज़मीन-जायज़ाद- यदि आप आर्थिक रूप से सक्षम हैं, तो आप पंडित को भूमि या घर दान कर सकते हैं।

श्राद्ध पूजन के बाद पंडित को दान करने के लिए कोई निश्चित नियम नहीं हैं। व्यक्ति अपनी आर्थिक स्थिति और इच्छानुसार पंडित को दान कर सकता है।

मृत्यु के बाद पहला श्राद्ध कब करना चाहिए

मृत्यु के बाद पहला श्राद्ध भी पितृ पक्ष के दौरान ही करना चाहिए। मृत व्यक्ति की मृत्यु की तिथि के अनुसार ही श्राद्ध उसी तिथि को किया जाना चाहिए। यदि मृत्यु की तिथि ज्ञात नहीं है तो श्राद्ध करने के लिए सबसे अच्छा दिन पितृपक्ष की अमावस्या तिथि होती है।

पहले श्राद्ध का महत्व बहुत अधिक है। ऐसा माना जाता है कि इस श्राद्ध से मृत व्यक्ति को मोक्ष की प्राप्ति होती है। श्राद्ध के दौरान, मृत व्यक्ति के लिए भोजन, जल, वस्त्र और अन्य आवश्यक वस्तुओं का दान किया जाता है। इसके साथ ही मृत व्यक्ति के लिए पितृ मंत्रों का जाप किया जाता है।

यदि आप किसी प्रियजन की मृत्यु के बाद पहला श्राद्ध कर रहे हैं, तो श्राद्धकर्म के लिए एक योग्य पंडित को बुलाना चाहिए ताकि शास्त्रों में वर्णित पूरे विधि-विधान से आपके प्रियजनों का श्राद्ध हो सके।

श्राद्ध में क्या नहीं करना चाहिए

श्राद्ध में हमें निम्नलिखित कार्य नहीं करने चाहिए:

  • बाल कटवाने से परहेज: श्राद्ध में हमें बाल, दाढ़ी और नाखून नहीं कटवाने चाहिए। ऐसा करने से पितरों को अपमान होता है।
  • तामसिक वस्तुओं से बनाकर रखें दुरी: श्राद्ध में तामसिक वस्तुओं का सेवन नहीं करना चाहिए। तामसिक वस्तुओं में मांस, मछली, अंडा, प्याज और लहसुन शामिल हैं।
  • अनुचित काम: श्राद्ध में किसी भी तरह का अनुचित काम नहीं करना चाहिए।
  • सहवास क्रिया: श्राद्ध में सहवास क्रिया नहीं करनी चाहिए।  ऐसा करने से पितरों को दुख होता है। पितृपक्ष में पितरों की पूजा करी जाती है इसीलिए इस दौरान ब्रह्मचर्य के नियमों का पालन करना चाहिए।
  • शराब : श्राद्ध में शराब का सेवन भी नहीं करना चाहिए।

इन कामों को करने से पितरों को दुख होता है और वे नाराज हो सकते हैं। इसलिए, श्राद्ध के दौरान इन कामों से बचना चाहिए। पितृपक्ष में अपने पितरों के प्रति पूर्ण श्रद्धा भाव रखते हुए श्राद्धकर्म करना चाहिए। ऐसा करने से वे प्रसन्न होते हैं और अपने वंशजों को आशीर्वाद देते हैं।

FAQ – Frequently Asked Questions

श्राद्ध कितने दिन चलते हैं ?

श्राद्ध (पितृपक्ष ) 16 दिन तक चलते हैं। इस दौरान पितरों को याद करके उनका तर्पण, श्राद्ध कर्म आदि किए जाते हैं।

पहला श्राद्ध किसका होता है ?

पहले श्राद्ध स्वाभाविक रूप से मरने वालों के लिए होता है। पहला और आखिरी श्राद्ध क्रमशः भाद्रपद शुक्ल पूर्णिमा श्राद्ध और आश्विन कृष्ण अमावस्या इन दोनों तिथियों को स्वाभाविक रूप से मरने वालों का श्राद्ध किया जाता है

पितरों को जल देते समय कौन सा मंत्र बोला जाता है ?

पितृपक्ष ( श्राद्ध ) में रोज सुबह स्नानादि करके जल में कला तिल डाल कर दक्षिण दिशा को ओर मुँह करके पितरों को जल अर्पित करते समय इस मंत्र का 3 बार जाप करना चाहिए – “ओम सर्वपितृ देवाय नमः

पितृपक्ष में कौन सी सब्जी नहीं बनानी चाहिए ?

पितृपक्ष (श्राद्ध ) में आलू, मूली, लहसुन-प्याज,अरबी, मसूर की दाल और चना। इन सब्जियों का सेवन नहीं करना चाहिए।

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