मासिक धर्म के बारे में कृष्ण क्या कहते हैं

मासिक धर्म के बारे में कृष्ण क्या कहते हैं। इस लेख में हम आपको बताएँगे मासिक धर्म के बारे में श्री कृष्ण ने क्या कहा है और हिन्दू धर्मग्रंथों में इसके लिए क्या दृष्टिकोण मिलता है।

मासिक धर्म के बारे में कृष्ण क्या कहते हैं

मासिक धर्म के बारे में कृष्ण क्या कहते हैं | Masik dharm ke bare me Krishna kya kehte hain

मासिक धर्म के बारे में कृष्ण क्या कहते हैं। यह एक ऐसा प्रश्न है जिसके बारे में सीधे तौर पर भगवत गीता या अन्य प्रमुख ग्रंथों में भगवान कृष्ण के मुख से कोई स्पष्ट और विस्तृत उपदेश नहीं मिलता है।

भगवद् गीता मुख्य रूप से आत्मा, कर्म, भक्ति और मोक्ष के बारे में दार्शनिक और आध्यात्मिक शिक्षाओं पर केंद्रित है, न कि शारीरिक कार्यों या सामाजिक नियमों पर।

हालाँकि अन्य शास्त्रों और पुराणों में मासिक धर्म को एक प्राकृतिक प्रक्रिया माना गया है, जो स्त्रियों की सृजन शक्ति का प्रतीक है।

भगवद्गीता के एक श्लोक से हमें इस प्रश्न का हल ढूंढने में सहायता मिलती है। भगवद्गीता (अध्याय 9, श्लोक 32) में कृष्ण कहते हैं:

“स्त्रियो वैश्यास्तथा शूद्रास्तेऽपि यान्ति परां गतिम्”

अर्थात: यानी स्त्रियाँ, वैश्य, शूद्र — कोई भी यदि भक्तिभाव से मेरा शरणागत होता है तो वह परमगति को प्राप्त कर सकता है।

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यहाँ भगवान् कृष्ण की कही गयी बात को → यदि हम स्त्री को ध्यान में रखते हुए समझें तो इस श्लोक का अर्थ यह है कि स्त्री की किसी भी शारीरिक स्थिति (जैसे मासिक धर्म) से उसकी भक्ति कम नहीं होती।

मासिक धर्म कोई दोष नहीं, बल्कि ईश्वर प्रदत्त प्राकृतिक शक्ति है। कृष्ण के लिए स्त्री की भक्ति, चाहे वह किसी भी अवस्था में हो, उतनी ही पवित्र और स्वीकार्य है।

धर्मशास्त्रों में मासिक धर्म के प्रति दृष्टिकोण

प्राचीन ग्रंथों जैसे मनुस्मृति और गरुड़ पुराण आदि में मासिक धर्म को एक शारीरिक अशुद्धि बताया गया है। मासिक धर्म के दौरान स्त्रियों द्वारा विश्राम करने, घरेलु कार्यों व कुछ धार्मिक कार्यों से दूर रहने की परंपरा रही है।

लेकिन यहाँ ध्यान दी वाली बात यह है कि इसे पाप या दोष नहीं माना गया, बल्कि यह शारीरिक शुद्धि-प्रक्रिया है।

इसी प्रकार वैष्णव परंपरा में माना जाता है कि मासिक धर्म के समय भी स्त्रियाँ मन ही मन जाप, ध्यान और भगवान का स्मरण कर सकती हैं।

दूसरी और स्त्रियों द्वारा विश्राम करने व् घरेलू , धार्मिक कार्यों से दूर रहने के पीछे का वैज्ञानिक दृष्टिकोण यह है कि मासिक धर्म के दौरान महिलाओं के शरीर में रक्त की कमी से थकान की समस्या होती है।

इसमें महिलाओं को पेट दर्द, मनोदशा परिवर्तन जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है। इसीलिए हमारे शास्त्रों में मासिक धर्म के लिए ऐसे निर्देश दिए गए हैं।

जिससे 3 से 7 दिन चलने वाले इस मासिक धर्म के चक्र की शारीरिक, मानसिक पीड़ा और असहजता से महिला आसानी से निपट सके।

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मासिक धर्म के नियम और वैज्ञानिक कारण

जब मासिक धर्म से जुड़े नियम बनाए गए थे, तो उनका उद्देश्य स्त्री की शारीरिक व मानसिक सेहत की रक्षा करना था। हिन्दू धर्म में मासिक धर्म के नियमों के वैज्ञानिक कारण इस प्रकार हैं।

आराम की आवश्यकता

इस दौरान स्त्री के शरीर में हार्मोनल परिवर्तन और रक्तस्राव होता है। शरीर थकावट, दर्द और कमजोरी महसूस करता है।

इसलिए धार्मिक अनुष्ठानों से अलग रखा गया ताकि महिला को पर्याप्त आराम मिल सके।

संक्रमण से बचाव

प्राचीन काल में सैनिटरी पैड या आधुनिक स्वच्छता साधन नहीं थे।

मंदिरों और यज्ञस्थलों को शुद्ध और पवित्र रखने के लिए और महिलाओं को बाहरी लोगों के संपर्क में आने से होने वाले संक्रमण आदि से बचाने के लिए वहाँ न जाने की परंपरा बनी।

ऊर्जा संतुलन

आयुर्वेद में बताया गया है कि मासिक धर्म के समय “अपान वायु” (शरीर की नीचे की ओर जाने वाली ऊर्जा) सक्रिय रहती है।

धार्मिक अनुष्ठान जैसे हवन, पूजा आदि का उद्देश्य “प्राण वायु” को प्रबल बनाना है। प्राण वायु – हृदय और श्वास से जुड़ी ऊपर की ओर जाने वाली ऊर्जा है, जो जीवनशक्ति और चेतना को जागृत करती है।

इसीलिए स्त्रियों को इस दौरान हवन, पूजा, यज्ञ आदि से दूर रखा गया, ताकि दोनों ऊर्जा प्रवाह (ऊपर की ओर और नीचे की ओर) में टकराव न हो

स्वच्छता और शुचिता

अलग कमरे में रहना और विशेष वस्त्र पहनना प्राचीन समय का Isolation ( एकांत ) था, जो किसी भी प्रकार के संक्रमण रोकने में सहायक था।

यह समाज की स्वच्छता व्यवस्था का एक हिस्सा था।

मानसिक शांति

मासिक धर्म के दौरान मूड स्विंग्स ( मनोदशा परिवर्तन ), चिड़चिड़ापन और थकान होती है। इसलिए पूजा-पाठ की जिम्मेदारियों से मुक्त रखा गया, ताकि मानसिक शांति मिल सके।

संक्षेप में, मासिक धर्म के बारे में कृष्ण क्या कहते हैं इस बारे में उनके द्वारा दिया गया कोई भी उपदेश नहीं मिलता है, लेकिन उनकी शिक्षाओं (जो भगवद् गीता में हैं) में मन की शुद्धता और आत्मा की प्रकृति पर जोर दिया गया है, जो शारीरिक अवस्थाओं से परे है।

मासिक धर्म से जुड़े नियम मुख्य रूप से स्वास्थ्य, ऊर्जा और प्राचीन परंपराओं पर आधारित हैं, न कि स्त्री को ‘अपवित्र’ मानने पर।

हिन्दू धर्म में ये नियम स्त्री को नीचा दिखाने के लिए नहीं, बल्कि उसकी सेहत, स्वच्छता और विश्राम के लिए बनाए गए थे। आधुनिक समय में स्वच्छता और स्वास्थ्य साधन उपलब्ध होने से बहुत-सी परंपराएँ धीरे-धीरे बदल भी रही हैं।

(Disclaimer: The material on hindumystery.com website provides information about Hinduism, its traditions and customs. It is for general knowledge and educational purposes only. Hindumystery website does not confirm this)




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