चरक संहिता के अनुसार भोजन के नियम

चरक संहिता के अनुसार भोजन के नियम केवल पेट भरने के लिए नहीं, बल्कि शरीर, मन और आत्मा के संतुलन के लिए बनाए गए हैं। इसमें भोजन को औषधि की तरह माना गया है।

चरक संहिता के अनुसार भोजन के नियम

चरक संहिता के अनुसार भोजन के नियम | charak samhita ke anusar bhojan ke niyam

चरक संहिता के नियम अनुसार व्यक्ति को सही समय पर ताज़ा और स्वच्छ भोजन करना चाहिए। भोजन मौसम के अनुसार और विविध रसों से युक्त होना चाहिए। भोजन से पहले भूखा होना और भोजन के दौरान मन का शांत होना बहुत जरूरी है। भोजन के बाद थोड़े विश्राम के लिए कहा गया है और अत्यधिक भोजन की मनाही है।

चरक संहिता में भोजन के जिन नियमों का पालन किया गया है उनका पालन करके मनुष्य सदैव स्वस्थ रहता है। उसे अपने शारीरिक विकास में मदद मिलती है।

चरक संहिता में अष्ट आहार विधि बताई गयी है जिसमे यह समझाया गया है कि कि क्या, कब, कैसे और कितना खाना चाहिए ताकि भोजन औषधि की तरह शरीर को पोषण दे सके:

प्रकृति भोजन की प्रकृति ( तासीर )

प्रत्येक आहार का अपना एक स्वभाव होता है अर्थात खाने पीने की वस्तुओं की अपनी एक तासीर होती है जो गर्म या ठंडी होती है।

ठंडी तासीर वाले खाद्य पदार्थ वो होते हैं जो शरीर में पित्त ( गर्मी ) को शांत करते हैं और शरीर को ठंडक प्रदान करते हैं। ऐसे खाद्य पदार्थ खासकर गर्मियों में बहुत फायदेमंद माने जाते हैं। जैसे – लौकी, खीरा, तरबूज़ इनकी तासीर ( प्रकृति ) ठण्डी होती है।

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इसी प्रकार गर्म तासीर वाले खाद्य पदार्थ भी होते हैं। इन खाद्य पदार्थों का सेवन आमतौर पर सर्दियों के मौसम में करना फायदेमंद रहता है, क्योंकि ये शरीर को गर्म रखने और सर्दी-जुकाम जैसी बीमारियों से बचाने में मदद करते हैं। जैसे – बाजरा, तिल, गुड़, शहद, कालीमिर्च इनकी तासीर ( प्रकृति ) गर्म होती है।

हमें अपनी शारीरिक प्रकृति (वात, पित्त, कफ) और मौसम के अनुसार भोजन चुनना चाहिए। जैसे पित्त प्रकृति वालों को गर्म तासीर वाले भोजन से परहेज करना चाहिए। कफ प्रकृति वाले लोगों को ठंडी तासीर वाले भोजन से बचना चाहिए।

कार्य – भोजन की प्रक्रिया या संस्कार

भोजन को पकाने, भूनने, पीसने, सुखाने, किण्वन (Fermentation) जैसी प्रक्रियाओं से उसका गुण बदल जाता है। जैसे दूध को उबालने से वह पचने में हल्का हो जाता है, दही को मट्ठा बनाने से उसका गुण ठंडा हो जाता है।

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संयोग – भोजन का संयोजन

सही आहार संयोजन (Food Combination) शरीर के लिए बहुत आवश्यक है। अगर गलत food combination वाला भोजन किया जाए ( जिसे विरुद्ध आहार भी कहते हैं ) तो इससे शरीर में कई रोग उत्त्पन्न हो सकते हैं।

विरुद्ध आहार के कुछ प्रमुख उदाहरण हैं – दूध + नमक ,, दूध + प्याज ,, दूध + मछली ( मांसाहारी भोजन ) भोजन का यह कॉम्बिनेशन शरीर में विषाक्तता पैदा करता है जिससे कई तरह के रोग उत्पन्न होते हैं।

सही संयोजन ( कॉम्बिनेशन ) का भोजन किया जाए तो यह शरीर को बल, ओज और रोग प्रतिरोधक क्षमता देता है।

राशि – भोजन की मात्रा

व्यक्ति द्वारा लिए जाने वाले आहार की मात्रा भी मानव शरीर के स्वास्थ्य में अहम भूमिका निभाती है।

भोजन की मात्रा के बारे में बताया गया है मनुष्य को आधा पेट भोजन करना चाहिए। पेट का एक – चौथाई भाग पानी के लिए और एक – चौथाई भाग हवा के लिए खाली छोड़ना श्रेष्ठ है।

अधिक खाना पाचन को बाधित करता है और काम खाना शरीर में कमज़ोरी लाता है।

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देश – क्षेत्र और वातावरण

हमें अपने आहार का चुनाव करते समय इस बात का ध्यान रखना है कि हम जिस स्थान पर रहते हैं, वहां के वातावरण के अनुसार हमें अपने भोजन का चुनाव करना चाहिए।

उदाहरण के लिए यदि हम किसी गर्म प्रदेश में रहते हैं तो हमें ठंडी तासीर और जलयुक्त भोजन का चुनाव करना चाहिए। इसी प्रकार ठंडे क्षेत्र में हमें गर्म तासीर के भोजन का चुनाव करना चाहिए।

काल – समय

भोजन करने का यह भी एक महत्वपूर्ण नियम है इस नियम के अनुसार भोजन ग्रहण करते मौसम को ध्यान में रखना चाहिए । ग्रीष्म ऋतू , शरद ऋतू आदि को ध्यान में रखते हुए भोजन का चुनाव करने चाहिए।

भोजन करते समय दिन और रात के समय के अनुसार ही भोजन करना चाहिए। क्यूंकि चरक संहिता में कुछ खाने पीने की वस्तुओं को दिन या रात में खाने की मनाही है।

जैसे: रात के समय दही के सेवन वर्जित है क्यूंकि रात के समय दही का सेवन करने से वात रोगों की समस्या होती है।

भोजन का चुनाव सदैव अपनी आयु के हिसाब से करना चाहिए क्यूंकि चरक संहिता में हर आयु वर्ग के हिसाब से भोजन को बांटा गया है। महर्षि चरक ने चरक संहिता में विस्तारपूर्वक बताया है कि बालयावस्था, किशोरावस्था, युवावस्था और वृद्धावस्था, मानव जीवन की किस अवस्था में कौन सा भोजन शरीर के लिए उपयुक्त रहेगा।

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उपयोगसंस्थान – खाने की विधि

चरक संहिता के अनुसार भोजन के नियम में बताया गया है कि भोजन सदैव बैठकर और शांत मन से करना चाहिए। भोजन हमेशा ध्यानपूर्वक करना चाहिए।

भोजन हमेशा धीरे – धीरे और चबाकर खाएँ जल्दी -जल्दी में कभी भी भोजन नहीं करना है। भोजन हमेशा भूख लगने पर ही करना चाहिए। बिना भूख के भोजन नहीं करना चाहिए।

उपयोगकर्ता – आहार ग्रहण करने वाला व्यक्ति

बीमार व्यक्ति को हल्का व पचने वाला भोजन देना चाहिए, जबकि स्वस्थ व्यक्ति संतुलित और विविध आहार ले सकता है।

हर व्यक्ति की आयु, शक्ति, पाचन, शारीरिक स्थिति, मानसिक अवस्था अलग होती है, उसी अनुसार आहार लेना चाहिए।

चरक संहिता के अनुसार भोजन के नियम का पालन शरीर और मन के संतुलन के लिए अत्यंत लाभकारी है। इससे पाचन शक्ति (अग्नि) मजबूत होती है, पोषक तत्वों का सही अवशोषण होता है और रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है। वात, पित्त, कफ संतुलित रहते हैं। यह जीवन को दीर्घ, स्वस्थ और उत्साही बनाने का प्राकृतिक मार्ग है।

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