परशुराम का इतिहास

परशुराम का इतिहास

परशुराम जी को भगवान् विष्णु का छठा अवतार माना जाता है। उनका जन्म वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को हुआ था। इस दिन को अक्षय तृतीया के नाम से जाना जाता है और हर साल अक्षय तृतीया के दिन परशुराम जयंती मनाई जाती है। मान्यता है कि इस दिन किया गया दान पुण्य कभी भी क्षय नहीं होता। परशुरामजी ने भी इसी दिन जन्म लिया था इसीलिए परशुराम की शक्ति भी अक्षय थी। हिन्दू मान्यताओं के अनुसार परशुराम सात चिरंजीवी देवों में से एक हैं और वे आज भी इस धरती पर मौजूद हैं। आज इस लेख में हम आपको परशुराम के जीवन से जुडी सभी बातें बताएँगे।

परशुराम का जब जन्म हुआ तो उनका नाम राम रखा गया। वे शिव भक्त थे उनहोंने शिवजी की कठोर तपस्या करी। भगवान् शिव ने प्रसन्न होकर उन्हें भिन्न-भिन्न प्रकार के अस्त्र-शस्त्र दिए। शिव के दिए अस्त्रों में उन्हें परशु अर्थात फरसा बहुत प्रिय था। आगे चलकर यह उनके नाम के साथ जुड़ गया और उन्हें परशुराम के नाम से जाना जाने लगा

भगवान् विष्णु ने परशुराम का अवतार क्यों लिया

भगवान् विष्णु का परशुराम के रूप में धरती पर अवतार लेने का उद्देश्य अत्याचारी राजाओं को समाप्त करना था। भगवान् विष्णु का लक्ष्य इस धरती को उन अत्याचारी राजाओं से मुक्त करना था जो अपनी प्रजा पर अत्याचार करते थे और अपने कर्तव्यों का पालन नहीं करते थे। जिस समय भगवान् परशुराम के अवतार ने धरती पर जन्म लिया उस समय धरती पर बहुत सारे दुष्ट और राक्षसी प्रवृत्ति वाले राजाओं का बोलबाला था। परशुराम ने इन्हीं दुष्टों से इस धरती को मुक्ति दिलाई।

परशुराम भगवान् विष्णु का छठा अवतार थे। हालाँकि परशुराम का जन्म एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था लेकिन फिर भी उनमें क्षत्रिय गुण विद्यमान थे जैसे – आक्रामकता, वीरता, युद्ध कौशल आदि। इसलिए उन्हें “ब्राह्मण-क्षत्रिय” के नाम से जाना जाता है।

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परशुराम के गुरु कौन थे

परशुराम के गुरु स्वयं भगवान् शिव थे। परशुराम ने भगवान् शिव से ही अनेक विधाएँ और अस्त्र-शास्त्र प्राप्त किये थे। उनहोंने अपनी युद्ध कला भगवान् शिव से ही सीखी थी।

शास्त्रों के अनुसार गुरु से शिक्षा लेने के बाद गुरु दक्षिणा की भी परंपरा है। परशुराम भी भगवान् शिव से शिक्षा लेने के बाद उन्हें दक्षिणा देना चाहते थे। जब परशुराम ने अपने गुरु भगवान् शिव से दक्षिणा के लिए कहा तो शिवजी ने उनसे कहा कि “मुझे गुरु दक्षिणा में शेष नाग का सिर चाहिए।” गुरु से आज्ञा लेकर भगवान परशुराम शेष नाग का सिर लाने चले गए।

रास्ते में उन्हें शिव धनुष टूटने की ऊँची ध्वनि सुनाई दी। अपने तपोबल से परशुराम ने पता लगाया कि शिव धनुष को राजा जनक की सभा में तोड़ा गया है। और उसी सभा में शेषनाग भी लक्ष्मण के रूप में मौजूद हैं। परशुराम राजा जनक की सभा में पंहुचे शिव धनुष तोड़े जाने की वजह से वे अत्यंत आक्रोशित हो गये थे। उन्होंने लक्ष्मण का सिर काटने का भी प्रयत्न किया किन्तु वे सफल न हो सके।

बाद में उन्हें पता चला की राम भगवान् विष्णु ही हैं और लक्ष्मण उनके भाई हैं। भगवान् विष्णु के प्रति अपनी श्रद्धा और प्रेमभाव के कारण उन्होंने लक्ष्मण का सिर नहीं काटा और परशुराम कभी भगवान् शिव को गुरु दक्षिणा नहीं दे पाए। यही परशुराम जी का गुरु ऋण था जिसे वो कभी नहीं उतार पाए।

परशुराम के माता पिता कौन थे

परशुराम जी का जन्म त्रेता युग एक ब्राह्मण के घर में हुआ था। उनके पिता महर्षि भृगु के पुत्र महर्षि जमदग्नि थे और उनकी माता का नाम रेणुका था। महर्षि जमदग्नि द्वारा किये गए पुत्रेष्टि यज्ञ से प्रसन्न देवराज इंद्र द्वारा दिए गए वरदान के फलस्वरूप परशुराम का जन्म हुआ। परशुराम का जन्म वैशाख शुक्ल तृतीया को मध्यप्रदेश के इंदौर जिला के ग्राम मानपुर के जानापाव पर्वत पर हुआ था। इनके जन्म समय को सतयुग और त्रेता युग का संधिकाल माना जाता है

नामकरण संस्कार के बाद इनका नाम राम रखा गया। कालांतर में भगवान् शिव से परशु ( फरसा ) प्राप्त करने के बाद इनका नाम परशुराम हो गया। महर्षि जमदग्नि के परशुराम के अलावा 4 पुत्र थे जिनके नाम हैं: वसु, सुषेण, रुमण्वान, विश्वावसु। परशुराम इन चारों से छोटे थे।

परशुराम ने अपनी माँ की हत्या क्यों की

परशुराम का स्वभाव अत्यंत आक्रामक था। वे अपने माता-पिता के परम भक्त थे। पौराणिक कथाओं के अनुसार एक बार परशुराम ने अपने पिता के कहने पर अपनी माता का भी वध कर दिया था। तो चलिए आपको बताते हैं कि परशुराम ने क्यों स्वयं की माता का वध किया था।

पौराणिक कथाओं के अनुसार एक बार परशुराम की माता रेणुका हवन हेतु जल लेने नदी पर गयीं। वहां पर उनहोंने गंधर्वराज चित्ररथ को जल में नौकाविहार करते हुए देखा। राजा चित्ररथ को देखकर ऋषि पत्नी के ह्रदय में विकार उत्पन्न हो गया। और वह वहां से उसी मनोदशा के साथ वापिस आश्रम में लौट आयीं।

आश्रम में जब ऋषि जमदग्नि ने अपनी पत्नी को देखा तो वे अपनी पत्नी के मन में आये इस विकार को जान गए। जिसकी वजह से ऋषि जमदग्नि बेहद क्रोधित हो गए। उन्होंने परशुराम से बड़े अपने चारों पुत्रों को अपनी माता के वध का आदेश दिया। किन्तु उन चारों में से किसी ने भी अपनी माँ के मोहवश अपने पिता की इस आज्ञा का पालन नहीं किया इससे ऋषि जमदग्नि का क्रोध और अधिक बढ़ गया। उनहोंने आज्ञा ना मानने के कारण अपने पुत्रों को विचार शक्ति खो देने का श्राप दिया।

इसके बाद ऋषि जमदग्नि ने अपने पुत्र परशुराम को आज्ञा दी कि अपनी माता का वध कर दो। परशुराम आज्ञाकारी पुत्र थे। इसीलिए उनहोंने अपने पिता की आज्ञा का पालन किया और अपनी माता का वध कर दिया। इससे ऋषि जमदग्नि परशुराम से प्रसन्न हो गए और उनहोंने परशुराम को मनचाहा वर मांगने को कहा। इस पर परशुराम ने अपने पिता से अपनी माता को को पुनःजीवित करने का वरदान माँगा। अपने पुत्र से अति प्रसन्न ऋषि जमदग्नि ने परशुराम को समस्त शाश्त्र और शस्त्र का ज्ञाता होने का आशीर्वाद दिया।

परशुराम ने 21 बार क्षत्रियों का वध क्यों किया

मान्यता है कि परशुराम परशुराम ने 21 बार इस धरती से समस्त क्षत्रियों का समूल नाश किया था। लेकिन यह तथ्य पूरी तरह सत्य नहीं है। यदि शास्त्रों-पुराणों का अध्ययन किया जाए तो पता चलता है कि परशुराम ने समस्त क्षत्रियों का नहीं अपितु हैहय वंश के क्षत्रियों का 21 बार इस धरती से नाश किया था। तो चलिए आपको बताते हैं कि परशुराम ने ऐसा क्यों किया।

परशुराम ने 21 बार क्षत्रियों का वध इसीलिए किया क्योंकि हैहय वंश के राजा सहस्त्रार्जुन ने लालच में आकर परशुराम के पिता से उनकी कामधेनु गाय छीन ली इससे क्रुद्ध होकर परशुराम ने राजा सहस्त्रार्जुन का वध कर दिया। राजा सहस्त्रार्जुन के पुत्रों ने अपने पिता के वध का बदला लेने के लिए परशुराम के पिता की हत्या कर दी। ऐसी मान्यता है कि अपने पिता के शव पर 21 घाव देखकर परशुराम ने हैहय वंश का समूल नाश करने की प्रतिज्ञा लीऔर उनहोंने 21 बार हैहय वंश के क्षत्रियों का अंत किया।

हैहय वंश के क्षत्रियों का नाश राजा सहस्त्रार्जुन की लालच के कारण हुआ। राजा सहस्त्रार्जुन के जन्म के समय उनका नाम अर्जुन था। अर्जुन ने भगवान् दत्तत्रेय को अपनी आराधना से प्रसन्न कर हजारो हाथो का वरदान प्राप्त किया। इसीलिए आगे चलकर उन्हें सहस्त्रार्जुन और सहस्त्रबाहु के नाम से जाना जाने लगा।

राजा सहस्त्रार्जुन इतने पराक्रमी थे की उनके पराक्रम से रावण भी घबराता था। एक बार राजा सहस्त्रार्जुन अपनी सेना के साथ विहार करते हुए परशुराम के पिता ऋषि जमदग्नि के आश्रम में पहुंचा। वहां ऋषि जमदग्नि ने अपनी चमत्कारी गाय कामधेनु के दूध से राजा और उसके सैनिकों की भूख मिटा दी। इस चमत्कार को देखकर राजा सहस्त्रार्जुन के मन में लालच आ गया और उसने ऋषि जमदग्नि से उनकी कामधेनु गाय बलपूर्वक छीन ली। इससे क्रोधित हैकर भगवान् परशुराम ने राजा सहस्त्रार्जुन का वध कर दिया।

फिर अपने पिता के वध का बदला लेने के लिए राजा सहस्त्रार्जुन के पुत्रों ने परशुराम के पिता ऋषि जमदग्नि की की हत्या कर दी। इससे आहत रेणुका अपने पति की चिता में प्रविष्ट होकर सती हो गयीं। फिर भगवान् परशुराम ने प्रतिज्ञा ली और 21 बार हैहय वंश के क्षत्रियों का अंत किया।

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भगवान् परशुराम जी की पूजा क्यों नहीं होती है

परशुराम जी भगवान् विष्णु का छठा अवतार हैं। परशुराम सात चिरंजीवी देवों में से एक हैं। अर्थात वे आज भी इस धरती पर मौजूद हैं। क्योंकि परशुराम अमर हैं इसीलिए अमर होने के कारण दूसरे देवी-देवताओं की तरह उनकी पूजा नहीं की जाती है।

FAQ – Frequently Asked Question

Q - परशुराम का मन्त्र क्या है ?
A - ॐ रां रा  परशुहस्ताय नम:॥ 
      ॐ रां रां परशुहस्ताय नमः
Q - परशुराम कितने शक्तिशाली थे ?
A - परशुराम भगवान् विष्णु के छठे अवतार थे। इसीलिए उन्हें स्वयं नारायण तथा भगवान् राम के समान शक्तिशाली माना जाता है 
Q - क्या परशुराम ने शादी की थी ?
A - परशुराम जी ने विवाह नहीं किया था। रामचरितमानस में उन्हें बाल ब्रह्मचारी बताया गया है। रामचरितमानस में उनके बारे में कहा गया है:
                  बाल ब्रह्मचारी अति कोही
                 विश्व विदित क्षत्रिय कुल द्रोही 
Q - परशुराम के पुत्रों का क्या नाम था ?
A - परशुराम ने विवाह नहीं किया था इसीलिए उनकी कोई संतान नहीं थी। 
Q - परशुराम जी की मृत्यु कैसे हुई ?
A - परशुराम जी की मृत्यु नहीं हुई।  हिन्दू धर्म में परशुराम सात चिरंजीवी देवों में से एक हैं इसीलिए वे आज भी इस धरती पे मौजूद हैं। 

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