Pradosh Vrat Katha : व्रत पूजन में इस कथा का पाठ करेगा सभी पापों को दूर

प्रदोष व्रत एक महत्वपूर्ण व्रत है। इस दिन व्रत करने के बाद Pradosh Vrat Katha का बहुत ही महत्व होता है। प्रदोष व्रत करने के बाद Pradosh Vrat Katha सुनने/पढ़ने का बहुत ही महत्व होता है। Pradosh Vrat Katha से प्रदोष व्रत का पूर्ण लाभ प्राप्त होता है।

Pradosh Vrat Katha

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Pradosh Vrat Katha

प्राचीन काल में एक गरीब पुजारी अपने परिवार के साथ रहा करता था। कुछ समय बाद उस पुजारी की मृत्यु हो गयी। पुजारी की मृत्यु के बाद उसकी विधवा पत्नी अपने पुत्र के भरण-पोषण के लिए भीख मांगने लगी।

इसी तरह दिन बीतने लगे, एक दिन उसे अपने पुत्र के समान एक युवक दिखाई पड़ा जो दर-दर भटक रहा था। पुजारी की पत्नी से उस युवक की यह हालत देखी नहीं गयी। वह उसे भी अपने घर ले आयी और अपने पुत्र की भांति ही उसका भी उसका भी ख्याल रखने लगी, और अपने दोनों पुत्रों के साथ ख़ुशी-ख़ुशी रहने लगी।

वह युवक वास्तव में विदर्भ देश का राजकुमार था। उसके पिता की मृत्यु के बाद उसे, षड़यंत्र करके राज्य से निकाल दिया गया था। और वह दर-दर भटकने को विवश हो गया था।

एक दिन पुजारी की पत्नी अपने दोनों पितरों के साथ शांडिल्य ऋषि के आश्रम में गयी। ऋषि आश्रम में पुजारी की पत्नी ने शांडिल्य ऋषि से प्रदोष व्रत की महिमा के बारे में जाना। ऋषि ने अंशुमती को बताया कि प्रदोष व्रत भगवान शिव को बहुत प्रिय है। इस व्रत को करने से सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं।

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पुजारी की पत्नी ने ऋषि से प्रदोष व्रत की कथा सुनी और उसने मन ही मन प्रण किया कि वह इस व्रत को अवश्य करेगी। घर आकर उसने भी प्रदोष व्रत करना शुरू कर दिया।

एक बार की बात है, वे दोनों वन में घूम रहे थे। पुजारी का पुत्र तो घर को लौट गया किन्तु, राजकुमार वन में ही घूमता रहा। उसने वन में गन्धर्व कन्याओं को क्रीड़ा करते हुए देखा तो वह उनके पास जाकर एक गन्धर्व कन्या से बातें करने लगा। उस कन्या का नाम अंशुमति था। इसके बाद राजकुमार घर लौट गया।

दूसरे दिन राजकुमार फिर उसी स्थान पर पहुंचा। वहां पर उसे अंशुमति फिर से मिली। अंशुमति ने उसे अपने माता-पिता से मिलवाया। अंशुमति के माता-पिता ने राजकुमार को पहचान लिया कि यह विदर्भ का राजकुमार है और इसका नाम धर्मगुप्त है।

उन्हें राजकुमार पसंद आया और उनहोंने राजकुमार के सामने अपनी पुत्री से विवाह का प्रस्ताव रख दिया। राजकुमार ने इसके लिए स्वीकृति दे दी। राजकुमार का अंशुमति के साथ विवाह संपन्न हो गया।

इसके बाद राजकुमार धर्मगुप्त ने गन्धर्व सेना की सहायता अपने राज्य को पुनः हासिल करने के लिए विदर्भ पर हमला कर दिया। एक भीषण युद्ध के बाद उसने विजय प्राप्त की और अपनी धर्मपत्नी अंशुमति के साथ वहां सुखपूर्वक राज्य करने लगा।

राजकुमार धर्मगुप्त अपने महल में पुजारी की पत्नी और उसके पुत्र को आदर के साथ अपने महल में ले आया। पुजारी और उसकी पत्नी को अपने दुःख और दरिद्रता भरे जीवन से छुटकारा मिला और वे सुखपूर्वक जीवन जीने लगे। इसी प्रकार सुखपूर्वक सभी का जीवन बीतने लगा।

एक दिन अंशुमति ने धर्मगुप्त से उसके जीवन से जुडी घटनाओं के बारे में जानना चाहा। तब धर्मगुप्त ने रानी अंशुमति को अपने पुरे जीवन की कथा सुनाई और प्रदोष व्रत की महिमा के बारे में भी बताया। तभी से प्रदोष व्रत का महत्व और अधिक बढ़ गया और लोग अपने जीवन की कठिनाईयों से छुटकारा पाने के लिए प्रदोष व्रत करने लगे।

व्रत पूजन के समय Pradosh Vrat Katha सुनने या पाठ करने से मनुष्य के जीवन के दुःख और दरिद्रता दूर हो जाते हैं और उसके पाप नष्ट हो जाते हैं। यह व्रत भगवान् शिव को समर्पित होता है इस दिन व्रत पूजन करने से भगवान् शिव की कृपा प्राप्त होती है।

प्रदोष व्रत के लाभ

प्रदोष व्रत को करने से व्यक्ति को सभी रोग-दोषों से मुक्ति मिलती है। इस व्रत को करने से व्यक्ति को भगवान शिव की कृपा प्राप्त होती है। प्रदोष व्रत करने से मनुष्य के जीवन के दुःख और दरिद्रता दूर हो जाते हैं और उसके पाप नष्ट हो जाते हैं।

(Disclaimer: यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. Hindumystery इसकी पुष्टि नहीं करता है.)

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